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यूहन्ना 8:39–47:
सच्‍चा पितृत्व और सत्य का अस्वीकार

39 इस पर उन्होंने उससे कहा, “हमारा पिता अब्राहम है।” यीशु ने उनसे कहा,“यदि तुम अब्राहम की संतान होते, तो तुम अब्राहम के समान कार्य करते। 40 परंतु अब तुम मुझे मार डालना चाहते हो, अर्थात् उस मनुष्य को जिसने तुम्हें वह सत्य बताया है जो उसने परमेश्‍वर से सुना। अब्राहम ने तो ऐसा नहीं किया। 41 तुम अपने पिता के कार्य करते हो।” तब उन्होंने कहा, “हम व्यभिचार से नहीं जन्मे; हमारा एक ही पिता है अर्थात् परमेश्‍वर।” 42 यीशु ने उनसे कहा,“यदि परमेश्‍वर तुम्हारा पिता होता तो तुम मुझसे प्रेम रखते, क्योंकि मैं परमेश्‍वर की ओर से आया और यहाँ हूँ; मैं अपने आपसे नहीं आया बल्कि उसी ने मुझे भेजा है। 43 क्या कारण है कि तुम मेरी बात नहीं समझते? इसलिए कि तुम मेरा वचन सुन नहीं सकते। 44 तुम अपने पिता शैतान की ओर से हो और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह आरंभ से ही हत्यारा है और सत्य पर कभी स्थिर नहीं रहा, क्योंकि उसमें सत्य नहीं है। जब वह झूठ बोलता है तो अपने स्वभाव से बोलता है, क्योंकि वह झूठा है और झूठ का पिता है। 45 परंतु इसलिए कि मैं सच बोलता हूँ, तुम मेरा विश्‍वास नहीं करते। 46 तुममें से कौन मुझे पाप का दोषी ठहराता है? यदि मैं सच बोलता हूँ तो क्या कारण है कि तुम मेरा विश्‍वास नहीं करते? 47 जो परमेश्‍वर की ओर से है वह परमेश्‍वर के वचनों को सुनता है। तुम इसलिए नहीं सुनते क्योंकि तुम परमेश्‍वर की ओर से नहीं हो।”
यूहन्ना 8:39–47 (HSB)

यूहन्‍ना 8:39–47 की सही व्याख्या

यह स्पष्ट करने के बाद कि अब्राहम के वंशज होना सच्‍ची स्वतंत्रता या परमेश्‍वर के साथ सही संबंध की गारंटी नहीं देता (यूहन्‍ना 8:31–38), यीशु अब चर्चा को और आगे ले जाता है। उसके सुननेवाले इस बात पर जोर देते हैं कि अब्राहम उनका पिता है और अंततः दावा करते हैं कि परमेश्‍वर स्वयं उनका पिता है। यीशु उत्तर देता है कि सच्‍ची संतान की पहचान पिता के समान होने से होती है: अब्राहम ने परमेश्‍वर के वचन को ग्रहण किया, जबकि वे उस व्यक्‍ति को मार डालना चाहते हैं जो उनसे सत्य बोलता है; और यदि परमेश्‍वर वास्तव में उनका पिता होता, तो वे उसके भेजे हुए पुत्र से प्रेम रखते।

(पद 39)
«इस पर उन्होंने उससे कहा, “हमारा पिता अब्राहम है।” यीशु ने उनसे कहा,“यदि तुम अब्राहम की संतान होते, तो तुम अब्राहम के समान कार्य करते।»

उसके सुननेवाले इस बात पर जोर देते हैं कि अब्राहम उनका पिता है।

यीशु पहले ही स्वीकार कर चुका था कि वे अब्राहम के शारीरिक वंशज हैं (यूहन्ना 8:37), परंतु अब वह उसकी वंशावली से होना और उस अर्थ में सचमुच उसकी संतान होना अलग करता है जिसमें कोई परमेश्‍वर के प्रति अब्राहम की प्रतिक्रिया को दर्शाता है।

“अब्राहम के समान कार्य करना” का अर्थ केवल अच्छे कार्य करना नहीं है। अब्राहम ने परमेश्‍वर का वचन ग्रहण किया, परमेश्‍वर द्वारा प्रकट की गई बात पर विश्‍वास किया और आज्ञाकारिता से उत्तर दिया।

यदि वे इस अर्थ में सचमुच अब्राहम की संतान होते, तो परमेश्‍वर के भेजे हुए के प्रति उनकी प्रतिक्रिया भी अब्राहम के समान होती।

(पद 40)
«परंतु अब तुम मुझे मार डालना चाहते हो, अर्थात् उस मनुष्य को जिसने तुम्हें वह सत्य बताया है जो उसने परमेश्‍वर से सुना। अब्राहम ने तो ऐसा नहीं किया।»

यीशु वह प्रमाण प्रस्तुत करता है जो उनके दावे का खंडन करता है।

उसने उन्हें वह सत्य बताया है जो उसने परमेश्‍वर से सुना, परंतु वे उसे मार डालना चाहते हैं।

“अब्राहम ने तो ऐसा नहीं किया।”

अब्राहम ने परमेश्‍वर की प्रकाशना का उत्तर दिया; इसके विपरीत, वे उस व्यक्‍ति को नष्ट करना चाहते हैं जो परमेश्‍वर की ओर से उनसे बोलने आया है।

इसलिए उनका आचरण दिखाता है कि शारीरिक रूप से अब्राहम के वंशज होने पर भी वे उसकी सच्‍ची संतान के समान कार्य नहीं कर रहे।

(पद 41)
«तुम अपने पिता के कार्य करते हो।” तब उन्होंने कहा, “हम व्यभिचार से नहीं जन्मे; हमारा एक ही पिता है अर्थात् परमेश्‍वर।”»

यीशु फिर जोर देता है कि उनके कार्य ऐसे पितृत्व को प्रकट करते हैं जो उनके दावे से अलग है।

वे अपना दावा और ऊँचा उठाते हुए उत्तर देते हैं: अब वे केवल यह नहीं कहते कि अब्राहम उनका पिता है, बल्कि यह कि परमेश्‍वर स्वयं उनका एकमात्र पिता है

“हम व्यभिचार से नहीं जन्मे” यह अभिव्यक्ति इस दावे को व्यक्त कर सकती है कि वे वैध रूप से परमेश्‍वर के लोगों में हैं और उसके प्रति किसी अविश्‍वासी संबंध से जुड़े हुए नहीं हैं। कुछ लोगों ने यहाँ यीशु के जन्म के विरुद्ध संभावित संकेत भी देखा है, परंतु यूहन्‍ना इसे स्पष्ट रूप से नहीं कहता।

निर्णायक बात इसके बाद का दावा है: “हमारा एक ही पिता है अर्थात् परमेश्‍वर।”

यीशु तुरंत इस दावे की परीक्षा करेगा।

(पद 42)
«यीशु ने उनसे कहा,“यदि परमेश्‍वर तुम्हारा पिता होता तो तुम मुझसे प्रेम रखते, क्योंकि मैं परमेश्‍वर की ओर से आया और यहाँ हूँ; मैं अपने आपसे नहीं आया बल्कि उसी ने मुझे भेजा है।»

यीशु उनके दावे की निर्णायक कसौटी रखता है।

यदि परमेश्‍वर वास्तव में उनका पिता होता, तो वे यीशु से प्रेम रखते, क्योंकि यीशु परमेश्‍वर की ओर से आया है और उसी ने उसे भेजा है।

जिस पुत्र को पिता ने भेजा है उसे अस्वीकार करते हुए पिता के साथ सच्‍चे संबंध का दावा नहीं किया जा सकता।

इसलिए यीशु के प्रति उनका रवैया उनके दावे की असच्‍चाई को प्रकट करता है: वे परमेश्‍वर से संबंधित होने का दावा करते हैं, परंतु उसी को अस्वीकार करते हैं जो परमेश्‍वर की ओर से आया है।

(पद 43)
«क्या कारण है कि तुम मेरी बात नहीं समझते? इसलिए कि तुम मेरा वचन सुन नहीं सकते।»

यीशु स्पष्ट करता है कि उनका न समझना केवल बौद्धिक समस्या नहीं है।

वे उसके वचनों को शारीरिक रूप से सुनते हैं, परंतु उन्हें सच्‍चे रूप से ग्रहण नहीं करते।

समस्या यीशु के प्रति उनकी मनोवृत्ति और उस संबंध में है जिसे उनके कार्य प्रकट कर रहे हैं। सत्य का उनका अस्वीकार उन्हें उसकी कही हुई बात ग्रहण करने से रोकता है।

अगला पद इस असमर्थता की जड़ को और स्पष्ट करेगा।

(पद 44)
«तुम अपने पिता शैतान की ओर से हो और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह आरंभ से ही हत्यारा है और सत्य पर कभी स्थिर नहीं रहा, क्योंकि उसमें सत्य नहीं है। जब वह झूठ बोलता है तो अपने स्वभाव से बोलता है, क्योंकि वह झूठा है और झूठ का पिता है।»

अंततः यीशु उस “पिता” की पहचान करता है जिसकी ओर वह पिछले पदों में संकेत कर रहा था।

उसके विरोधी शैतान के समान दिखाई देते हैं, क्योंकि वे वही करना चाहते हैं जो उसके कार्यों की विशेषता है।

यीशु पहले उसे “आरंभ से ही हत्यारा” बताता है। मानव इतिहास के आरंभ से ही शैतान का कार्य मृत्यु से जुड़ा रहा, और पवित्रशास्‍त्र शीघ्र दिखाता है कि पाप किस प्रकार हत्या तक भी पहुँचा।

फिर वह उसे सत्य के पूर्ण विरोध में प्रस्तुत करता है: “उसमें सत्य नहीं है” और वह झूठ का “पिता” है।

यह विशेष रूप से उत्पत्ति 3:4–5 में सर्प के छल को स्मरण कराता है, जहाँ झूठ ने मनुष्य को पाप और मृत्यु की ओर ले गया।

इस प्रकार विरोध और स्पष्ट हो जाता है। उसके सुननेवाले यीशु को मार डालना चाहते हैं और उसके बोले हुए सत्य को अस्वीकार करते हैं; इन्हीं कार्यों के द्वारा वे उस हत्यारे और झूठे के समान दिखाई देते हैं।

(पद 45)
«परंतु इसलिए कि मैं सच बोलता हूँ, तुम मेरा विश्‍वास नहीं करते।»

यीशु उनके विरोध की गहराई दिखाता है।

वे उसे इसलिए अस्वीकार नहीं करते कि उन्होंने उसके वचनों में झूठ पाया है, बल्कि इसलिए कि वह जो सत्य बोलता है वह उस बात से टकराता है जिसे वे ग्रहण करना चाहते हैं।

इस प्रकार पिछले पद का विरोध पुष्ट होता है: यीशु वह सत्य बोलता है जो पिता की ओर से आता है, जबकि वे झूठ के प्रति अपना झुकाव दिखाते हैं

(पद 46)
«तुममें से कौन मुझे पाप का दोषी ठहराता है? यदि मैं सच बोलता हूँ तो क्या कारण है कि तुम मेरा विश्‍वास नहीं करते?»

यीशु एक असाधारण चुनौती देता है: वह अपने विरोधियों को यह सिद्ध करने के लिए बुलाता है कि वह पाप का दोषी है।

उनमें से कोई ऐसा आरोप प्रस्तुत नहीं कर सकता जो उसकी निष्कलंकता को असिद्ध कर दे।

इसलिए अगला प्रश्न और भी तीखा हो जाता है: यदि वे उसमें पाप सिद्ध नहीं कर सकते और यीशु सच बोलता है, तो वे उसका विश्‍वास क्यों नहीं करते?

उत्तर यीशु में किसी झूठ में नहीं, बल्कि उन लोगों की दशा में है जो उसके वचनों को ग्रहण करने से इंकार करते हैं।

(पद 47)
«जो परमेश्‍वर की ओर से है वह परमेश्‍वर के वचनों को सुनता है। तुम इसलिए नहीं सुनते क्योंकि तुम परमेश्‍वर की ओर से नहीं हो।”»

यीशु पूरी चर्चा की जड़ प्रकट करते हुए निष्कर्ष देता है।

जो “परमेश्‍वर की ओर से है” वह परमेश्‍वर से आनेवाले वचनों को सुनता है।

इसके विपरीत, उसके विरोधी यीशु के वचनों को ग्रहण नहीं करते। और क्योंकि यीशु वही बोलता है जो उसने पिता से प्राप्त किया है, उनका अस्वीकार दिखाता है कि वे परमेश्‍वर की ओर से नहीं हैं, यद्यपि वे दावा करते हैं कि परमेश्‍वर उनका पिता है।

इस प्रकार यीशु पद 41 में उनके अपने ही दावे को पूरी तरह उलट देता है। वे कहते हैं: “हमारा एक ही पिता है अर्थात् परमेश्‍वर”; यीशु दिखाता है कि परमेश्‍वर के वचन के प्रति उनका रवैया ठीक इसके विपरीत प्रमाण देता है।

निहितार्थ

  • सच्‍ची संतान पिता के समान होने से पहचानी जाती है: कार्य प्रकट करते हैं कि कोई वास्तव में किससे संबंधित है।
  • अब्राहम का वंशज होना सच्‍ची अब्राहमी संतान होने की गारंटी नहीं देता: परमेश्‍वर की प्रकाशना के प्रति प्रतिक्रिया निर्णायक है।
  • पुत्र को अस्वीकार करते हुए पिता से प्रेम नहीं किया जा सकता: जो वास्तव में परमेश्‍वर से संबंधित है वह यीशु को ग्रहण करता है, जिसे परमेश्‍वर ने भेजा।
  • शैतान हत्या और झूठ से पहचाना जाता है: जो सत्य को अस्वीकार करते और यीशु को नष्ट करना चाहते हैं, वे उसके समान दिखाई देते हैं।
  • यीशु के वचनों के प्रति प्रतिक्रिया परमेश्‍वर के साथ संबंध को प्रकट करती है: जो परमेश्‍वर की ओर से है वह उससे आनेवाले वचनों को सुनता है।

अनुप्रयोग

  • विरासत में मिली धार्मिक पहचान पर भरोसा मत करो: किसी परंपरा से संबंधित होना परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची प्रतिक्रिया का स्थान नहीं लेता।
  • यीशु को उस व्यक्‍ति के रूप में ग्रहण करो जो पिता की ओर से आया है: उसके पुत्र को अस्वीकार करते हुए यह दावा नहीं किया जा सकता कि तुम परमेश्‍वर से प्रेम करते हो।
  • सत्य से प्रेम करो, तब भी जब वह तुम्हारे विचारों या इच्छाओं का सामना करे: उसका विरोध करते रहना हृदय को और कठोर करता है।
  • जाँचो कि तुम्हारे कार्य क्या प्रकट करते हैं: आचरण दिखाता है कि वास्तव में तुम्हारे जीवन पर किसका प्रभाव है।
  • परमेश्‍वर के वचनों को आज्ञा मानने की तत्परता से सुनो: मसीह के वचन को ग्रहण करना परमेश्‍वर के साथ सच्‍चे संबंध को प्रकट करता है।

सारांश

यूहन्‍ना 8:39–47 में यीशु के विरोधी पहले दावा करते हैं कि अब्राहम उनका पिता है और फिर कि परमेश्‍वर स्वयं उनका पिता है। यीशु दिखाता है कि उनके कार्य दोनों दावों का खंडन करते हैं। अब्राहम ने परमेश्‍वर की प्रकाशना का उत्तर दिया, जबकि वे उस व्यक्‍ति को मार डालना चाहते हैं जो उन्हें परमेश्‍वर से सुना हुआ सत्य बताता है। और यदि परमेश्‍वर वास्तव में उनका पिता होता, तो वे यीशु से प्रेम रखते, क्योंकि वह पिता की ओर से आया और उसी ने उसे भेजा है। अंततः यीशु उस पितृत्व की पहचान करता है जिसे उनके कार्य वास्तव में दर्शाते हैं: वे मार डालना चाहते हैं और सत्य को अस्वीकार करते हैं, इस प्रकार शैतान के समान दिखाई देते हैं, जिसे यीशु हत्यारा और झूठ का पिता बताता है। तर्क इस बात पर समाप्त होता है कि जो परमेश्‍वर की ओर से है वह परमेश्‍वर के वचनों को सुनता है; इसलिए यीशु के वचनों का उनका अस्वीकार दिखाता है कि अपने धार्मिक दावों के बावजूद वे परमेश्‍वर की ओर से नहीं हैं।

प्रार्थना

हे हमारे पिता, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तूने यीशु मसीह के द्वारा सत्य कहा है और स्पष्ट रूप से प्रकट किया है कि तू कौन है।

केवल अपने इतिहास, अपनी परंपराओं या अपने विषय में किए गए दावों पर भरोसा करने से हमारी रक्षा कर।

हमें ऐसा हृदय दे जो तेरे पुत्र से प्रेम करे, उसके वचन को ग्रहण करे और तेरी ओर से आनेवाले सत्य का आज्ञाकारिता से उत्तर दे।

हमें झूठ और उस हर बात से छुड़ा जो हमें तेरे सत्य का विरोध करने की ओर ले जाए। हमारे वचनों और कार्यों के द्वारा यह प्रकट कर कि हम वास्तव में तेरे ही हैं।

हम यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में माँगते हैं। आमीन।

अध्ययन लेखक: Enrique Contreras
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पवित्रशास्त्र का पाठ नवीन हिंदी बाइबल© से लिया गया है।
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Scripture taken from the HINDI STANDARD BIBLE©
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