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यूहन्ना 8:12–20:
यीशु स्वयं को जगत की ज्योति घोषित करता है और अस्वीकार का उत्तर देता है

12 यीशु ने लोगों से फिर कहा,“जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह कभी अंधकार में नहीं चलेगा बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा।” 13 तब फरीसियों ने उससे कहा, “तू स्वयं अपने विषय में साक्षी देता है। तेरी साक्षी सच्‍ची नहीं है।” 14 इस पर यीशु ने उनसे कहा,“भले ही मैं अपने विषय में साक्षी दूँ फिर भी मेरी साक्षी सच्‍ची है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। परंतु तुम नहीं जानते कि मैं कहाँ से आया हूँ या कहाँ जा रहा हूँ। 15 तुम शरीर के अनुसार न्याय करते हो, मैं किसी का न्याय नहीं करता। 16 और यदि मैं न्याय करूँ भी तो मेरा न्याय सच्‍चा है, क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि इसमें मैं हूँ और पिता है जिसने मुझे भेजा है। 17 फिर तुम्हारी व्यवस्था में भी लिखा है कि दो मनुष्यों की साक्षी सच्‍ची है। 18 मैं अपने विषय में साक्षी देता हूँ, और पिता भी जिसने मुझे भेजा है, मेरे विषय में साक्षी देता है।” 19 तब वे उससे कहने लगे, “तेरा पिता कहाँ है?” यीशु ने उत्तर दिया,“तुम न तो मुझे और न ही मेरे पिता को जानते हो। यदि तुम मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जानते।” 20 उसने ये बातें मंदिर-परिसर में उपदेश देते हुए कोषागार के पास कहीं; और किसी ने भी उसे नहीं पकड़ा, क्योंकि अभी उसका समय नहीं आया था।
यूहन्ना 8:12–20 (HSB)

यूहन्‍ना 8:12–20 की सही व्याख्या

झोपड़ियों के पर्व के दौरान हुए विवादों के बाद, यीशु मंदिर में सार्वजनिक रूप से उपदेश देना जारी रखता है। अब वह स्वयं को “जगत की ज्योति” घोषित करता है, और जब फरीसी उसकी साक्षी की सच्‍चाई पर प्रश्न उठाते हैं, तब यीशु फिर अपने मूल, पिता के साथ अपने संबंध और यह पहचानने में उनकी असमर्थता की ओर संकेत करता है कि वह वास्तव में कौन है।

(पद 12)
«यीशु ने लोगों से फिर कहा,“जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह कभी अंधकार में नहीं चलेगा बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा।”»

यीशु केवल यह नहीं कहता कि वह ज्योति के विषय में शिक्षा देता है या उसकी ओर जाने का मार्ग दिखाता है। वह घोषणा करता है: “जगत की ज्योति मैं हूँ।”

ज्योति की यह छवि सुसमाचार के आरंभ से ही सामने आ चुकी थी। यीशु में जीवन था, और वह जीवन “मनुष्यों की ज्योति” था (यूहन्ना 1:4–5); वही सच्‍ची ज्योति है जो जगत में आई (यूहन्ना 1:9)।

इसके अतिरिक्त, यह घोषणा झोपड़ियों के पर्व के संदर्भ में होती है। इस उत्सव के दौरान मंदिर के स्‍त्रियों के आँगन में बड़े दीपक जलाए जाते थे। यह पृष्ठभूमि यीशु की इस घोषणा को विशेष रूप से अर्थपूर्ण बनाती है कि वह “जगत की ज्योति” है।

यीशु यह भी समझाता है कि यह ज्योति कैसे प्राप्त होती है: “जो मेरे पीछे हो लेगा”

उसके पीछे हो लेने का अर्थ केवल उसकी शिक्षा की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसे पहचानना, उसके वचनों को ग्रहण करना और उसके मार्गदर्शन में चलना है।

परिणाम दोहरा है: वह व्यक्‍ति अंधकार में चलता नहीं रहेगा, बल्कि “जीवन की ज्योति” पाएगा। यूहन्‍ना में अंधकार उन लोगों की दशा को दर्शाता है जो परमेश्‍वर द्वारा अपने पुत्र में दी गई प्रकाशना और जीवन से अलग बने रहते हैं।

इसलिए यीशु केवल जानकारी नहीं देता: वह स्वयं वह ज्योति है जो जीवन की ओर ले जाती है

(पद 13)
«तब फरीसियों ने उससे कहा, “तू स्वयं अपने विषय में साक्षी देता है। तेरी साक्षी सच्‍ची नहीं है।”»

फरीसी यीशु की इस घोषणा का सीधे उत्तर नहीं देते कि वह जगत की ज्योति है।

वे उसकी साक्षी की सच्‍चाई पर प्रश्न उठाते हैं: उनके अनुसार, क्योंकि यीशु अपने विषय में स्वयं साक्षी देता है, इसलिए उसकी घोषणा को स्थापित नहीं माना जा सकता।

यह यूहन्‍ना 5:31–37 की पिछली चर्चा स्मरण कराता है, जहाँ यीशु पहले ही उस सिद्धांत पर बात कर चुका था कि किसी बात को केवल एक व्यक्‍ति की साक्षी पर स्थापित नहीं किया जाना चाहिए।

परंतु अब फरीसी इस सिद्धांत का उपयोग उसकी घोषणा को अस्वीकार करने के लिए करते हैं, बिना यह विचार किए कि यीशु कौन है और उन्हें पहले से कौन-कौन सी दूसरी साक्षियाँ मिल चुकी हैं।

(पद 14)
«इस पर यीशु ने उनसे कहा,“भले ही मैं अपने विषय में साक्षी दूँ फिर भी मेरी साक्षी सच्‍ची है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। परंतु तुम नहीं जानते कि मैं कहाँ से आया हूँ या कहाँ जा रहा हूँ।»

यीशु स्पष्ट करता है कि उसकी स्थिति अद्वितीय है। भले ही वह अपने विषय में स्वयं साक्षी दे, फिर भी उसकी साक्षी सच्‍ची है, क्योंकि उसके पास वह ज्ञान है जो उसके आरोप लगानेवालों के पास नहीं: वह जानता है कि वह कहाँ से आया है और कहाँ जा रहा है

वह केवल नासरत, गलील या किसी भौगोलिक गंतव्य की बात नहीं कर रहा। यीशु जानता है कि वह पिता की ओर से आया है और पिता के पास लौटेगा।

यह विषय यूहन्‍ना 7 से विकसित होता आ रहा है। उसके सुननेवाले सोचते हैं कि वे उसके जीवन की कुछ बाहरी बातों को जानने के कारण उसका मूल जानते हैं, परंतु वे उसके सच्‍चे मूल से अनजान हैं। इसीलिए वे केवल मानवीय जानकारी के आधार पर स्वर्गीय वास्तविकता का मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं और उसकी साक्षी का सही न्याय नहीं कर पाते।

(पद 15)
«तुम शरीर के अनुसार न्याय करते हो, मैं किसी का न्याय नहीं करता।»

“तुम शरीर के अनुसार न्याय करते हो” यह बताता है कि फरीसी यीशु का मूल्यांकन किस प्रकार कर रहे थे: बाहरी रूप और केवल मानवीय मानदंडों के अनुसार। यह यूहन्ना 7:24 में दी गई उसकी पिछली चेतावनी से जुड़ता है।

जब यीशु आगे कहता है, “मैं किसी का न्याय नहीं करता”, तो वह यह नहीं नकार रहा कि उसके पास न्याय करने का अधिकार है। यही सुसमाचार पहले बता चुका है कि पिता ने न्याय पुत्र को सौंपा है (यूहन्‍ना 5:22, 27)।

यीशु उनके समान, मानवीय मानदंडों के अनुसार न्याय नहीं करता। इसके अतिरिक्त, उस समय उसका कार्य अंतिम दंड को लागू करना नहीं, बल्कि जगत को जीवन प्राप्त करने का अवसर देना है (यूहन्ना 3:17)।

इसीलिए अगला पद बिना किसी विरोधाभास के कह सकता है कि यदि यीशु न्याय करे भी, तो उसका न्याय सच्‍चा है।

(पद 16)
«और यदि मैं न्याय करूँ भी तो मेरा न्याय सच्‍चा है, क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि इसमें मैं हूँ और पिता है जिसने मुझे भेजा है।»

जब यीशु न्याय करता है, तो उसका न्याय सच्‍चा है, क्योंकि वह पिता से स्वतंत्र होकर कार्य नहीं करता: न्याय करते समय वह उसे भेजनेवाले पिता के साथ एकता में है।

यह पहले स्थापित की गई सच्‍चाई को आगे बढ़ाता है: पुत्र अपनी ओर से स्वतंत्र होकर कार्य नहीं करता, बल्कि पिता के साथ पूर्ण सामंजस्य में कार्य करता है (यूहन्‍ना 5:19–30)। इसलिए उसका न्याय सच्‍चा और धार्मिक है।

(पद 17–18)
«फिर तुम्हारी व्यवस्था में भी लिखा है कि दो मनुष्यों की साक्षी सच्‍ची है। मैं अपने विषय में साक्षी देता हूँ, और पिता भी जिसने मुझे भेजा है, मेरे विषय में साक्षी देता है।”»

अब यीशु उसी कानूनी सिद्धांत का उपयोग करके उत्तर देता है जिसका वे स्वयं सहारा ले रहे हैं।

व्यवस्था ठहराती थी कि किसी मामले की पुष्टि दो या अधिक गवाहों की साक्षी से होनी चाहिए (व्यवस्थाविवरण 19:15)।

फरीसी तर्क देते हैं कि यीशु केवल अपने विषय में स्वयं साक्षी देता है। यीशु उत्तर देता है कि वह अकेला नहीं है:

वह अपने विषय में साक्षी देता है, और पिता भी जिसने उसे भेजा है, उसके विषय में साक्षी देता है।

यीशु पहले ही समझा चुका था कि पिता किस प्रकार साक्षी देता है: उन कार्यों के द्वारा जिन्हें उसने यीशु को करने के लिए दिया और पवित्रशास्‍त्र के द्वारा जो उसके विषय में साक्षी देता है (यूहन्ना 5:36–39)।

इसलिए उसके शत्रुओं के पास साक्षी की कमी नहीं है। समस्या यह है कि वे स्वयं परमेश्‍वर द्वारा उनके सामने रखी गई साक्षी को अस्वीकार करते हैं।

(पद 19)
«तब वे उससे कहने लगे, “तेरा पिता कहाँ है?” यीशु ने उत्तर दिया,“तुम न तो मुझे और न ही मेरे पिता को जानते हो। यदि तुम मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जानते।”»

फरीसी पूछते हैं: “तेरा पिता कहाँ है?”

यह प्रश्न दिखाता है कि वे उस संबंध को नहीं समझते जिसकी यीशु बात कर रहा है, या वे उस दूसरे गवाह की पहचान माँग रहे हैं जिसका उसने अभी उल्लेख किया है।

परंतु यीशु चर्चा को फिर मूल समस्या पर ले आता है: वे वास्तव में पिता को नहीं जानते

यह घोषणा विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यह उन लोगों से कही जा रही है जो अपने आपको परमेश्‍वर को जाननेवाले और उसका पक्ष लेनेवाले मानते थे।

यीशु घोषणा करता है कि पिता को जानने को पुत्र को जानने से अलग नहीं किया जा सकता:

“यदि तुम मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जानते।”

इसका अर्थ यह नहीं कि यीशु और पिता एक ही व्यक्‍ति हैं। पाठ स्वयं दोनों के बीच लगातार भेद करता है: पिता भेजता है और पुत्र भेजा गया है

इसका अर्थ है कि पुत्र पिता को पूर्ण रूप से प्रकट करता है। इसलिए पुत्र को अस्वीकार करना दिखाता है कि उसे भेजनेवाले पिता को भी वास्तव में नहीं जाना गया है।

(पद 20)
«उसने ये बातें मंदिर-परिसर में उपदेश देते हुए कोषागार के पास कहीं; और किसी ने भी उसे नहीं पकड़ा, क्योंकि अभी उसका समय नहीं आया था।»

यूहन्‍ना स्पष्ट करता है कि यीशु ने ये बातें मंदिर के कोषागार के पास कहीं, जो स्‍त्रियों के आँगन के क्षेत्र में था। यह उसकी शिक्षा के सार्वजनिक स्वरूप को रेखांकित करता है: यीशु छिपा हुआ नहीं था। फिर भी किसी ने उसे नहीं पकड़ा।

इसका कारण यह नहीं था कि उसके शत्रुओं ने अपना विरोध छोड़ दिया था। यूहन्‍ना फिर सच्‍चा कारण बताता है: “अभी उसका समय नहीं आया था”

जैसा पहले हुआ था, मानवीय विरोध यीशु के कार्य की पूर्णता के लिए ठहराए गए समय को पहले नहीं ला सकता।

निहितार्थ

  • यीशु केवल ज्योति नहीं लाता: वह स्वयं जगत की ज्योति है। जीवन और परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान उसी में मिलता है।
  • यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ अंधकार को छोड़ना है: जो उसके पीछे हो लेता है वह जीवन की ज्योति पाता है।
  • शरीर के अनुसार किया गया न्याय यीशु को सही रूप से पहचान नहीं सकता: उसके विरोधी केवल मानवीय मानदंडों से उसका मूल्यांकन कर रहे थे।
  • यीशु के पास न्याय करने का अधिकार है: “मैं किसी का न्याय नहीं करता” उस अधिकार को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसके न्याय को फरीसियों के न्याय से और जीवन लाने के उसके वर्तमान कार्य से अलग दिखाता है।
  • पिता पुत्र की साक्षी की पुष्टि करता है: यीशु उससे स्वतंत्र होकर नहीं बोलता।
  • पुत्र को अस्वीकार करते हुए पिता को सच्‍चे रूप से नहीं जाना जा सकता: यीशु ही पिता को प्रकट करता है।
  • यीशु का समय परमेश्‍वर के उद्देश्य के अधीन बना रहता है: उसके शत्रु उसे पहले नहीं ला सकते।

अनुप्रयोग

  • यीशु के पीछे ज्योति के रूप में हो लो: केवल उसके वचनों को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं; उसे अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने दो।
  • बाहरी रूप के अनुसार न्याय मत करो: निष्कर्ष बनाने से पहले सत्य की जाँच करो।
  • यीशु को केवल मानवीय श्रेणियों तक सीमित मत करो: उसके मूल और पिता के साथ उसके संबंध के विषय में उसकी अपनी घोषणा पर विचार करो।
  • परमेश्‍वर ने अपने पुत्र के विषय में जो साक्षी दी है उसे सुनो: उसके वचन, उसके कार्य और पवित्रशास्‍त्र उसकी ओर संकेत करते हैं।
  • पुत्र के द्वारा पिता को जानने का प्रयास करो: यीशु को अस्वीकार करना उसे भेजनेवाले को सही रूप से जानने से रोकता है।

सारांश

यूहन्‍ना 8:12–20 में यीशु स्वयं को जगत की ज्योति घोषित करता है और कहता है कि जो उसके पीछे हो लेगा वह अंधकार में नहीं चलेगा, बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा। फरीसी उसकी साक्षी पर प्रश्न उठाते हैं, परंतु यीशु उत्तर देता है कि उसकी साक्षी सच्‍ची है, क्योंकि वह अपना मूल और गंतव्य जानता है और पिता भी उसके विषय में साक्षी देता है। वह बताता है कि वे शरीर के अनुसार न्याय करते हैं और न उसे जानते हैं, न पिता को। यीशु दिखाता है कि उसे जानना पिता को जानने से जुड़ा है। विरोध के बावजूद कोई उसे नहीं पकड़ता, क्योंकि उसका समय अभी नहीं आया था। यह अध्ययन दिखाता है कि यीशु ज्योति है, उसका अधिकार पिता के साथ उसकी एकता से जुड़ा है और उसके सुननेवालों की मूल समस्या यह है कि वे उसे सच्‍चे रूप से नहीं जानते।

प्रार्थना

हे हमारे पिता, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तूने अपने पुत्र में जीवन देनेवाली सच्‍ची ज्योति को प्रकट किया है।

हे प्रभु, अंधकार में चलने या बाहरी रूप के अनुसार न्याय करने से हमारी रक्षा कर। मसीह के पीछे हो लेने और उसकी दी हुई ज्योति में जीने में हमारी सहायता कर। अपने पुत्र के द्वारा तुझे जानने के लिए हमें स्पष्ट समझ दे।

तेरे सत्य पर भरोसा रखने, मसीह के अधिकार को पहचानने और तूने जो प्रकट किया है उसके अनुसार जीने दे। हमें हमेशा अपनी ज्योति में चला और उस हर बात से दूर रख जो हमें तुझसे दूर करती है।

हम यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में माँगते हैं। आमीन।

अध्ययन लेखक: Enrique Contreras
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पवित्रशास्त्र का पाठ नवीन हिंदी बाइबल© से लिया गया है।
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